Sunday, 21 March, 2010

दिल्ली में ठाकरे की राजनीती तलाशती शीला दीक्षित

आज शीला दीक्षित इस बात पर दिल्ली की और दिल्ली वासियों की सराहना कर रही है की दिल्ली में कोई ठाकरे परिवार नहीं है. पर ज़रा ध्यान देने वाली बात यह है की यह वही शीला दीक्षित है जिसने कि पिछले साल दिल्लीवासियों को क्षेत्रवाद के नाम पर बांटने की कोशिश की थी. इसी शीला दीक्षित ने यह बयान दिया था की दिल्ली में बाहर से आनेवालों की तादाद बहुत बढ़ गयी है इसलिए यहाँ सुविधाएं देना सरकार के बस की नहीं है. पर न ही तो कभी दिल्ली में किसी प्रकार का कोई क्षेत्रवाद कभी राजनैतिक रूप से पनपा है और न ही दिल्लीवासी कभी इस तरह के विचारों को कोई एहमियत देते हैं. दिल्ली ही क्या बल्कि दुनिया का कोई भी शहर हो, वहाँ हमेशा से दूसरे प्रान्तों या देशों से लोग आते ही हैं और आ कर बसते ही हैं, यही इतिहास में होता आया है और यही प्रेक्टिकल है और किसी भी शहर या देश की तरक्की के लिए आवश्यक है.

पर जब शीला दीक्षित यह समझ गयी की ठाकरे परिवार की तर्ज़ पर चल कर उसका यह राजनैतिक पैंतरा उलटा उस पर ही भारी पड़ने वाला है तो इसने अपनी छवि सुधारने के लिए इस साल यह कहा की दिल्ली सबकी है और यहाँ सबके लिए जगह है. इस बात पर दिल्ली के लोगों ने शीला दीक्षित का खूब मजाक बनाया की आखिर वह होती कौन है यह बताने वाली की दिल्ली किसकी है और किसकी नहीं.

शीला की बातों से साफ़ ज़ाहिर होता है की पहले उसने खुद ठाकरे बनने की कोशिश करी और जब खुद न बन पाई तो कहीं न कहीं दिल्ली में एक ठाकरे बनाना चाहती है. पर ऐसा क्यों?

दिल्ली जो कि कभी दिलवालों का शहर कहलाया जाता था आज कहीं न कहीं मुंबई कि तरह पैसेवालों का शहर बनता जा रहा है. एक तरफ जहां दिल्ली की संस्कृति नष्ट हो रही है, वहीं दूसरी तरफ पैसे की हाए - तौबा मच रही है. ज़ाहिर सी बात है की जब लड्डू गिनती के होंगे तो खाने वालों में लड़ाई होना संभव है. पर एक तरफ ऐसे समाज का तबका है जिसे या तो पारिवारिक सम्पनता से जीवन में तरक्की मिली है या ऐसा जो कि निरंतर प्रयास से जीवन में उठ रहा है. अब बच जाते हैं दो तबके, एक, जिन्हें न ही तो पारिवारिक और न ही सरकार से कोई सहायता मिलती है और दूसरे वह जो कि शहरों के निर्माण के लिए गाँवों से शहर में आ कर बसते हैं.

पर जब समाज का हर तबका निरंतर मेहनत कर रहा है तो कैसे उन्हें आपस में उलझा कर बेवकूफ बनाया जाए और जनता का मेहनत से कमाया हुआ पैसा कैसे लूटा जाए, यहीं से शुरू होती है शीला की दिल्ली में ठाकरे को तलाशने की इच्छा. आखिर शीला भी तो लड्डू खाने की शौकीन होंगी.

शीला शायद भूल चुकी है की उसकी यह 'फूट डालो और राज करो' की ब्रिटिश साम्राज्य की नीति हिन्दुस्तान का बच्चा - बच्चा जानता है और फिर दिल्ली तो ब्रिटिश साम्राज्य की आखिरी राजधानी रही है जहाँ से ब्रिटिश साम्राज्य का दमन हुआ है.

निखिल सबलानिया

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